ये शहर,
कभी अजनबी, कभी अनजाना सा लगता है
और कभी कभी दोस्त पुराना सा लगता है
कभी ये मेला कोई लगता है,
कभी भीड़ में भी तन्हाई का एहसास कराता है,
तो कभी अकेलेपन में दोस्त नया दे जाता है
यहाँ एक समुन्दर का किनारा है,
मेरी हर शाम वही कटती है,
ये लहरें ही तो हैं, एक हमराज़ दोस्त की तरह,
अपनी हर छोटी बड़ी बात इनसे कह जाता हूँ,
कभी कोई दुःख, या कभी कोई नयी खुशखबरी मिली हो
तो सबसे पहले इन्हें ही आकर बताता हूँ
मेरी तरह और भी कई आते हैं,
अपनी अपनी भाषा में अपने अपने राज़ बताते हैं,
ये शहर जैसे एक चटनी की तरह है,
थोडा खट्टा, थोडा मीठा तो कभी थोडा तीखा
नजाने कितने मसालों और मसलों से बनी है ये चटनी,
शायद तभी इसका स्वाद इतना निराला है
सोचता था न जाने मुंबई कैसा होगा,
इतनी भीड़, इतनी भागदौड़, क्या संभल पाऊंगा मैं?
सच बोलूं तो कई बार गिरा हूँ यहाँ,
पर आखिर में इसी शहर ने संभाला है मुझे,
और संभालते संभालते,
आज शायद अपने पैरों पर खड़ा होना भी सिखा दिया है
ये चटनी जैसा शहर,
कभी तो बहुत हसाता है,
और कभी रुला सा जाता है,
लेकिन फिर जब भी घर वापस जाने को जी करता है,
तो जैसे ये शहर हाथ मेरा थाम जाता है
कोई जादू है यहाँ,
की इतने लोगों की भीड़ में भी,
अपनी खुद की एक जगह मिल जाती है,
इस शहर में मानो जैसे
करोड़ों छोटी छोटी दुनिया हैं,
हर कोई अपनी एक दुनिया चुन लेता है
और फिर उसी में खो जाता है
ये शहर जैसे हर किसी को अपनी बाहों में बुलाता है,
एक सपनो की दुकान ही तो है चटनी जैसा शहर,
क्योंकि देखा जाए तो, यहाँ हर किसी का कोई ना कोई सपना है
और इस भागदौड़ में वही एक ख्याल ही तो बस अपना है
उसी ख्याल को लेकर
औरों की तरह हर शाम यहाँ आता हूँ
इस चटनी जैसे शहर का स्वाद कुछ और चखने
Photograph by: Sarika Gangwal
Written by: Abhinav Chandel
