
यादों का कबीला,
आज फिर मुझे तेरे शहर ले जाता है,
सर्दियों की उन सुबह,
जब हलकी से धुंध से निकल,
तुम सूरज बन मेरे सामने आती थी,
मुस्कुराती थीं,
और फिर धीरे से अपने शब्दों का रस,
मेरे कानों में घोल जाती थी
यादों का कबीला,
आज फिर मुझे उन रातों की याद दिलाता है,
खुला आसमान और अमावस की वह रात,
तारों की चादर तले,
बैठा मेरा चाँद मेरे साथ,
और फिर चुपके से अपने होठों के निशाँ,
मेरे गालों पर तुम छोड़ जाती थी,
मेरे काँधे पर सर रख, गीत कई गुनगुनाती थी
यादों का कबीला,
आज फिर मुझे उन सुनहरी सुबहों की तरफ खींच लाता है,
सूरज की किरणों का दुपट्टा ओढ़े तुम पायल छनकाती आती थी,
लगता जैसे हर सुबह, हर दिन
मुझे तुमसे मिलाने के लिए ही जगाती थी,
और फिर तुम मुस्कुरा कर, थोड़ा इठला कर
मेरे नज़दीक बैठ, अपने हाथों बनी चाय की खुशबु से
मुझे प्यार से उठती
यादों का कबीला,
आज फिर उस चाय के प्याले की तरह,
एक अजीब सी खुशनुमा गर्माहट मुझमे छोड़ जाता है,
कुछ पल याद दिलाता है, तो कुछ भूलने पर मजबूर कर जाता है
यादों का कबीला,
आज फिर मुझे तुम्हारी तस्वीर के पास ले आता है,
जो तुम साथ नहीं तो क्या हुआ,
वह आज भी सुबह की पहली किरण संग, तुम्हारी कुछ नयी यादें मेरे दरवाज़े पर छोड़ जाता है|
Photograph by: Sarika Gangwal
Written by: Abhinav Chandel