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Tag Archives: letter

Intezaar Karunga Tumhara

Last evening while walking through the woods, a piece of paper flew and landed at my feet. It was a love letter without any name on it, which might have lost its destination or maybe the last sign of a love that doesn’t matter anymore, said the friend walking along with me. But hey, who said that a love stops mattering because it doesn’t, a love lasts forever. Sometimes as a tear, sometimes as a smile.

However, it reminded me of him. He made me proofread a letter he had written for her. I didn’t know who he was, I just met him during one my visits to a nearby village. He said if she’d say yes then he’d invite me to his marriage, he never did.

I guess he had forgotten. But I still haven’t forgotten that letter.

His first love letter…

आज सुबह ही अपने गाँव पहुंचा मैं, बड़ी कड़ाके की ठण्ड थी| हल्के कोहरे को चीरती हुई जब बस अपनी ही मस्ती में आगे बढे जा रही थी, तो कुछ नारियल के पेड़ दिखाई दिए थे| वही पेड़ जहाँ बचपन में न जाने कितना वक़्त पकड़न-पकड़ाई खेलते हुए बिता देते थे| याद है, एक दिन तुमने कहा था, “सुनो जब हम बड़े हो जायेंगे तब भी इन्ही पेड़ों के पास आया करेंगे, मुझे और इन्हें भूलोगे तो नहीं?” फिर तुमने पास पड़े एक पत्थर पर उस पेड़ पे हमारा नाम उकेर दिया था और कहा था की आज से ये ‘हमारा’ पेड़ है|

हमारा पेड़, जहाँ हम रोज़ आया करते थे स्कूल के बाद, याद है एक बार मास्टरजी ने पकड़ लिया था| तुम्हारे बापू ने तीन दिन तक तुम्हे घर में बंद रखा था और मेरे बाप ने मेरी जमके पिटाई करी थी| पर हमारा मिलना कभी नहीं रुका, और एक दिन नए मास्टरजी ने पकड़ा था| न जाने क्यूँ मुस्कुरा दिया थे वो, शायद वो भी किसी के साथ कभी इन पेड़ों की छाओं तले वक़्त बिताते थे|

याद है हर शनिवार को तुम मेरी पसंद के दाल चावल लाया करती थी अपने टिफिन में, कहती थी क्यूंकि हम रविवार को नहीं मिल पाएंगे इसलिए शनिवार का स्पेशल, और फिर चुप चाप बैठ मुझे खाता देख मुस्कुराती रहती थी तुम| हाँ और मुझे आज भी याद है, हर शनिवार घर जाने से पहले मेरे गाल को चूमके कहती थी “मुझे मिस करोगे न तुम?” और मैं इस डर में रहता था की कहीं तुम मुझे न भुला बैठो|

आज इन्ही पेड़ो को देख तुम्हारी फिर बहुत याद आ रही है, यहीं तो हम दोनों ने जाना था एक दुसरे के प्यार को और कसम भी खायी थी की शादी करेंगे तो एक दूसरे से वरना नहीं| देखो आज भी तुम्हारे इंतज़ार में बैठा हूँ|

जब कॉलेज गया था मैं, तब भी हम आखरी बार यहीं मिले थे| तुम्हारी आँखों में आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, याद है मेरा हाथ घंटो तक पकड़ कर बैठी रही थी तुम उस रात| और फिर उन्ही पेड़ों के नीचे ही हम सो गए थे, खैर सोये कहाँ थे बस जाग कर तारे देखे थे सारी रात | फिर सुबह जब तुम्हे बोला की मैं कॉलेज नहीं जाना चाहता, तो  मुझे चांटा मार कर तुमने कहा था “बुद्धू कॉलेज नहीं जाओगे, तो मेरे पिताजी  से मेरा हाथ कैसे मांगोगे| उन्हें तो एक पढ़ा लिखा दामाद चाहिए|” और जब मैंने तुम्हे साथ चलने को कहा, तो तुमने “पिताजी  अकेले पड़ जायेंगे” कह कर टाल दिया था|

देखो आज मैं शहर से वापस आ गया हूँ, ये पांच साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला| अब तो नौकरी भी मिल गयी है, और शायद मांगने लायक हो गया हूँ| चलोगी ना मेरे साथ तुम, जहाँ भी मैं ले जाऊं और बनोगी ना मेरा साथ, की कभी गर जो मैं गिर जाऊं| पांच साल हो गए तुम्हे देखे हुए, बस खतो के द्वारा ही तुम्हे जाना है इस समय में| क्या आज भी मुझे तुम उतना ही प्यार कर पाओगी? आज तुम्हे अपने गले लगाने के लिए मेरे पास एक हाथ कम है, क्या अभी भी मेरे गले लगना चाहोगी?

ये ख़त तुम्हारे दरवाजे पे छोड़ रहा हूँ| जो अभी भी अगर प्यार करती हो, तो आ जाना उन नारियल के पेड़ों के नीचे, इंतज़ार करूँगा तुम्हारा उसी फिरोज़ी शर्ट में जो तुमने मुझे कॉलेज जाते वक़्त दी थी|

इंतज़ार करूँगा तुम्हारा…

 

Photography by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel 

 

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