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Tag Archives: hindi

Yaadon ka Kabila


यादों का कबीला,
आज फिर मुझे तेरे शहर ले जाता है,
सर्दियों की उन सुबह,
जब हलकी से धुंध से निकल,
तुम सूरज बन मेरे सामने आती थी,
मुस्कुराती थीं,
और फिर धीरे से अपने शब्दों का रस,
मेरे कानों में घोल जाती थी

यादों का कबीला,
आज फिर मुझे उन रातों की याद दिलाता है,
खुला आसमान और अमावस की वह रात,
तारों की चादर तले,
बैठा मेरा चाँद मेरे साथ,
और फिर चुपके से अपने होठों के निशाँ,
मेरे गालों पर तुम छोड़ जाती थी,
मेरे काँधे पर सर रख, गीत कई गुनगुनाती थी

यादों का कबीला,
आज फिर मुझे उन सुनहरी सुबहों की तरफ खींच लाता है,
सूरज की किरणों का दुपट्टा ओढ़े तुम पायल छनकाती आती थी,
लगता जैसे हर सुबह, हर दिन
मुझे तुमसे मिलाने के लिए ही जगाती थी,
और फिर तुम मुस्कुरा कर, थोड़ा इठला कर
मेरे नज़दीक बैठ, अपने हाथों बनी चाय की खुशबु से
मुझे प्यार से उठती

यादों का कबीला,
आज फिर उस चाय के प्याले की तरह,
एक अजीब सी खुशनुमा गर्माहट मुझमे छोड़ जाता है,
कुछ पल याद दिलाता है, तो कुछ भूलने पर मजबूर कर जाता है

यादों का कबीला,
आज फिर मुझे तुम्हारी तस्वीर के पास ले आता है,
जो तुम साथ नहीं तो क्या हुआ,
वह आज भी सुबह की पहली किरण संग, तुम्हारी कुछ नयी यादें मेरे दरवाज़े पर छोड़ जाता है|

 

Photograph by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel

Forgotten Spears

“She waited from the first blossom of the spring,
Till the last raindrop of the monsoon
And when she was about to close her eyes, she realized
Maybe he’ll arrive with the first dewdrops of winter”

November 2010

आज भी चुनरी से टप टप कर तुम्हारी यादें टपकती रही, आज भी सिरहाने के कोने से तुम्हारे संग बितायी रातें टपकती रही| आज फिर पिताजी ने शादी की बात छेड़ी थी, आज भी रह रह कर हर आहट तुम्हारे आने का ही एहसास करा रही थी| आज भी हर बादल के संग, तुम्हारे होने की एक आस आती है| आज भी हर झोंके के संग हवा तुम्हारी साँसों का संदेशा लाती है, न जाने क्यों इतना तड़पाते हो, आ कर अब मुझे क्यों नहीं ले जाते हो| अब बस भी करो ना, देखो हाथों की मेहँदी आज भी तुम्हारे बिना फीकी सी रह गयी|

“In her almirah, she hid all the letters
She had written for him,
The letters, which still waited for an address
Of that beautiful destination to deliver the magical words
She stored in them.
The stars searched for him,
As she asked moon to deliver her messages to him,
Everynight.”

June 2011

आज कॉलेज के बैग में कुछ ख़त पड़े हुए मिले थे, याद है तुमने दिए थे| आज मुझे संदूक में वो किताब मिली थी, जो तुमने स्कूल में दी थी| याद है वो गुलाब जो पिछली मुलाक़ात में तुमने मुझे दिया था, आज भी उस किताब में मौजूद है| उस गुलाब को आज भी इंतज़ार है उन उँगलियों का जिन्होंने कभी उन्हें अपने प्यार के साथ किसी को पकड़ाया था, और किसी गुलाब को आज भी इंतज़ार है उन उँगलियों का जिन्होंने कभी उसकी पंखुड़ियों को धीरे से सहलाया था और एक भँवरे की तरह चूम कर आने वाली हर रात को खूबसूरत बना दिया था| आज भी उन्ही रातों को अपनी झोली में संभाले वो गुलाब बैठा है इंतज़ार में, अब तो आ जाओ|

“Once again she stayed awake from the midnight
When once he used to catch her last tear,
Till the first morning light
When once he used to convert that tear into the first smile”

January 2012

आज की रात सब बहुत खुश थे, पिताजी कह रहे थे इससे अच्छा लड़का मुझे नहीं मिल सकता| मैं हँस दी, मन तो था की बता दूँ मुझे पहले ही ऐसा कोई मिल चुका है| वही जिसकी याद में कल एक और रात जग कर बिता दी थी| आज मेहँदी न जाने क्यों खिल कर आ रही है, आज न जाने क्यों तुम्हारे आने की आस न जाने क्यों फिरसे आ रही है? देखो आज भी हर पल में तुम्हारा ही नाम लिखा है, कल रात भी सोते हुए आखिरी सपना तुम्हारा ही दिखा है| न जाने ससुराल कैसा होगा, न जाने जो पिताजी ने मेरे लिए चुना है वो तुम्हारे जैसा होगा| न जाने तुम कब आओगे, न जाने संग अपने कब ले जाओगे|

“With the first rays of sun, drenched by her tears,
With the last rays of moonlight, once again she caressed her fears
She looked at those letters for the last time,
As the tears washed away his memories to the bottom of her heart,
Where they still give her a comforting pain after all these years,

Those forgotten spears…”

Photography by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel 

चटनी जैसा शहर

 

ये शहर,

कभी अजनबी, कभी अनजाना सा लगता है

और कभी कभी दोस्त पुराना सा लगता है

 

कभी ये मेला कोई लगता है,

कभी भीड़ में भी तन्हाई का एहसास कराता है,

तो कभी अकेलेपन में दोस्त नया दे जाता है

 

यहाँ एक समुन्दर का किनारा है,

मेरी हर शाम वही कटती है,

ये लहरें ही तो हैं, एक हमराज़ दोस्त की तरह,

अपनी हर छोटी बड़ी बात इनसे कह जाता हूँ,

कभी कोई दुःख, या कभी कोई नयी खुशखबरी मिली हो

तो सबसे पहले इन्हें ही आकर बताता हूँ

 

मेरी तरह और भी कई आते हैं,

अपनी अपनी भाषा में अपने अपने राज़ बताते हैं,

ये शहर जैसे एक चटनी की तरह है,

थोडा खट्टा, थोडा मीठा तो कभी थोडा तीखा

नजाने कितने मसालों और मसलों से बनी है ये चटनी,

शायद तभी इसका स्वाद इतना निराला है

 

सोचता था न जाने मुंबई कैसा होगा,

इतनी भीड़, इतनी भागदौड़, क्या संभल पाऊंगा मैं?

सच बोलूं तो कई बार गिरा हूँ यहाँ,

पर आखिर में इसी शहर ने संभाला है मुझे,

और संभालते संभालते,

आज शायद अपने पैरों पर खड़ा होना भी सिखा दिया है

 

ये चटनी जैसा शहर,

कभी तो बहुत हसाता है,

और कभी रुला सा जाता है,

लेकिन फिर जब भी घर वापस जाने को जी करता है,

तो जैसे ये शहर हाथ मेरा थाम जाता है

 

कोई जादू है यहाँ,

की इतने लोगों की भीड़ में भी,

अपनी खुद की एक जगह मिल जाती है,

इस शहर में मानो जैसे

करोड़ों छोटी छोटी दुनिया हैं,

हर कोई अपनी एक दुनिया चुन लेता है

और फिर उसी में खो जाता है

 

ये शहर जैसे हर किसी को अपनी बाहों में बुलाता है,

एक सपनो की दुकान ही तो है चटनी जैसा शहर,

क्योंकि देखा जाए तो, यहाँ हर किसी का कोई ना कोई सपना है

और इस भागदौड़ में वही एक ख्याल ही तो बस अपना है

 

उसी ख्याल को लेकर

औरों की तरह हर शाम यहाँ आता हूँ

इस चटनी जैसे शहर का स्वाद कुछ और चखने

 

Photograph by: Sarika Gangwal 

Written by: Abhinav Chandel 

Pariyo si…

नीले आसमानों में कुछ काले बादल,

बादलों में बारिश की कुछ बूँदें,

बूंदों की मासूमियत,

सच बोल,

उन्होंने वो तुझसे ही पायी हैं ना?

 

बागों में फूल

फूलों में रंग,

रंगों वाली एक इन्द्रधनुष की रेखा,

सच बोल,

वो अपनी उँगलियों से तूने ही बनायीं है ना?

 

सुनसान रास्तों पर कोहरे से घिरा,

खड़ा हूँ मैं

और रह रह कर किसी की खुशबू  का एहसास हो जाता है आज,

सच बोल,

इन कोहरे की परतों को चीरती हुई,

मेरे नज़दीक तू आई है ना?

 

मेरे हाथों में एक गिटार,

गिटार की तारों से खेलती मेरी उँगलियों,

और बन जाती है कुछ नयी धुनें,

सच बोल,

कल रात सपने में आकर,

तूने ही गुनगुनायी  है ना?

 

जंगलों से गुज़रती एक राह,

उन पर कुछ क़दमों के निशाँ,

ले जाती मुझे मेरे बिछरे यार के करीब,

सच बोल,

अपने कोमल पैरों से,

वो निशानों वाली चादर तुने ही बिछायी है ना?

 

काली काली ये रातें,

और खोया खोया सा मैं,

आँखों से दूर आज नींद मेरी,

सच बोल,

अपने जादू से,

तूने ही चुराई है ना?

 

एक खाली कागज़,

उस पर सरपट दौड़ती कलम,

और कुछ अनकहे अजनबी शब्दों से बनती एक कविता,

सच बोल,

अपनी इन आँखों से,

तूने ही बतलायी है ना?

 

Neele aasmaano mein kuch kaale baadal,

Baadlon mein baarish ki kuch boondein,

Boondon ki masoomiyat,

Sach bol,

Unhone woh tujhse hi payee hai na?

 

Baagon mein phool,

Phoolon mein rang,

Rangon waali indradhanush ki rekha,

Sach bol,

Woh apni ungliyon se tune hi banayee hai na?

 

Sunsaan raaston par kohre se ghira,

Khada hun main,

Aur reh reh kar kisi ki khushboo ka ehsaas ho jaata hai aaj,

Sach bol,

Inn kohre ki parto ko cheerti hui,

Mere nazdeek tu aayee hai na?

 

Mere haathon mein ek guitar,

Guitar ki taaron se khelti meri ungliyan,

Aur ban jaati hain kuch nayi dhunein,

Sach bol,

Kal raat sapne mein aakar,

Tune hi gungunayee hai na?

 

Junglon se guzarti ek raah,

Unn par kuch kadmo ke nishaan,

Le jaati mujhe mere bichre yaar ke kareeb,

Sach bol,

Apne komal pairon se,

Woh nishaano waali chaadar tune hi bichayee hai na?

 

Kali kali ye raatein,

Aur khoya khoya sa main,

Aankhon se duur aaj neend meri,

Sach bol,

Apne jaadu se,

Tune hi churayee hai na?

 

Ek khali kagaz,

Uss par sarpat daudti kalam,

Aur kuch ankahe ajnabee shabdo se banti ek kavita,

Sach bol,

Apni inn aankhon se,

Tune hi batlayee hai na?

 

Photograph by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel

Intezaar Karunga Tumhara

Last evening while walking through the woods, a piece of paper flew and landed at my feet. It was a love letter without any name on it, which might have lost its destination or maybe the last sign of a love that doesn’t matter anymore, said the friend walking along with me. But hey, who said that a love stops mattering because it doesn’t, a love lasts forever. Sometimes as a tear, sometimes as a smile.

However, it reminded me of him. He made me proofread a letter he had written for her. I didn’t know who he was, I just met him during one my visits to a nearby village. He said if she’d say yes then he’d invite me to his marriage, he never did.

I guess he had forgotten. But I still haven’t forgotten that letter.

His first love letter…

आज सुबह ही अपने गाँव पहुंचा मैं, बड़ी कड़ाके की ठण्ड थी| हल्के कोहरे को चीरती हुई जब बस अपनी ही मस्ती में आगे बढे जा रही थी, तो कुछ नारियल के पेड़ दिखाई दिए थे| वही पेड़ जहाँ बचपन में न जाने कितना वक़्त पकड़न-पकड़ाई खेलते हुए बिता देते थे| याद है, एक दिन तुमने कहा था, “सुनो जब हम बड़े हो जायेंगे तब भी इन्ही पेड़ों के पास आया करेंगे, मुझे और इन्हें भूलोगे तो नहीं?” फिर तुमने पास पड़े एक पत्थर पर उस पेड़ पे हमारा नाम उकेर दिया था और कहा था की आज से ये ‘हमारा’ पेड़ है|

हमारा पेड़, जहाँ हम रोज़ आया करते थे स्कूल के बाद, याद है एक बार मास्टरजी ने पकड़ लिया था| तुम्हारे बापू ने तीन दिन तक तुम्हे घर में बंद रखा था और मेरे बाप ने मेरी जमके पिटाई करी थी| पर हमारा मिलना कभी नहीं रुका, और एक दिन नए मास्टरजी ने पकड़ा था| न जाने क्यूँ मुस्कुरा दिया थे वो, शायद वो भी किसी के साथ कभी इन पेड़ों की छाओं तले वक़्त बिताते थे|

याद है हर शनिवार को तुम मेरी पसंद के दाल चावल लाया करती थी अपने टिफिन में, कहती थी क्यूंकि हम रविवार को नहीं मिल पाएंगे इसलिए शनिवार का स्पेशल, और फिर चुप चाप बैठ मुझे खाता देख मुस्कुराती रहती थी तुम| हाँ और मुझे आज भी याद है, हर शनिवार घर जाने से पहले मेरे गाल को चूमके कहती थी “मुझे मिस करोगे न तुम?” और मैं इस डर में रहता था की कहीं तुम मुझे न भुला बैठो|

आज इन्ही पेड़ो को देख तुम्हारी फिर बहुत याद आ रही है, यहीं तो हम दोनों ने जाना था एक दुसरे के प्यार को और कसम भी खायी थी की शादी करेंगे तो एक दूसरे से वरना नहीं| देखो आज भी तुम्हारे इंतज़ार में बैठा हूँ|

जब कॉलेज गया था मैं, तब भी हम आखरी बार यहीं मिले थे| तुम्हारी आँखों में आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, याद है मेरा हाथ घंटो तक पकड़ कर बैठी रही थी तुम उस रात| और फिर उन्ही पेड़ों के नीचे ही हम सो गए थे, खैर सोये कहाँ थे बस जाग कर तारे देखे थे सारी रात | फिर सुबह जब तुम्हे बोला की मैं कॉलेज नहीं जाना चाहता, तो  मुझे चांटा मार कर तुमने कहा था “बुद्धू कॉलेज नहीं जाओगे, तो मेरे पिताजी  से मेरा हाथ कैसे मांगोगे| उन्हें तो एक पढ़ा लिखा दामाद चाहिए|” और जब मैंने तुम्हे साथ चलने को कहा, तो तुमने “पिताजी  अकेले पड़ जायेंगे” कह कर टाल दिया था|

देखो आज मैं शहर से वापस आ गया हूँ, ये पांच साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला| अब तो नौकरी भी मिल गयी है, और शायद मांगने लायक हो गया हूँ| चलोगी ना मेरे साथ तुम, जहाँ भी मैं ले जाऊं और बनोगी ना मेरा साथ, की कभी गर जो मैं गिर जाऊं| पांच साल हो गए तुम्हे देखे हुए, बस खतो के द्वारा ही तुम्हे जाना है इस समय में| क्या आज भी मुझे तुम उतना ही प्यार कर पाओगी? आज तुम्हे अपने गले लगाने के लिए मेरे पास एक हाथ कम है, क्या अभी भी मेरे गले लगना चाहोगी?

ये ख़त तुम्हारे दरवाजे पे छोड़ रहा हूँ| जो अभी भी अगर प्यार करती हो, तो आ जाना उन नारियल के पेड़ों के नीचे, इंतज़ार करूँगा तुम्हारा उसी फिरोज़ी शर्ट में जो तुमने मुझे कॉलेज जाते वक़्त दी थी|

इंतज़ार करूँगा तुम्हारा…

 

Photography by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel 

 

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