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Behen

No Ordinary Cinderella … The only person who cherished me, made me feel like I was a somebody, instead of a nobody. The only person that truly cared, the only person that mattered to me…My Sister. – Sarika

“बहन” वो तो सबकी होती है, आपकी भी होगी पर हमारी नहीं थी…. उनके आने तक|

हम रहीम खान, उम्र १८ साल, नसबंदी कॉलोनी, दिल्ली के रहने वाले हैं, अम्मी और अब्बू १६ साल पहले दिल्ली आये थे जिला फिरोजाबाद (उ.प.) से| आर्थिक स्तिथि ऐसी थी की अम्मी और अब्बू दोनों का काम करना ज़रूरी था| पास में ही बन रही एक इमारत में मिस्त्री के तौर पर काम मिला था उन्हें, हालाँकि मसला ये था की पीछे से हमें कहाँ छोड़ा जाए| बगल में ही रहती थीं वो, आरती चाची की बेटी| मज़े की बात बताएं, हमने कभी उनका नाम ही नहीं पूछा | सब उन्हें गुड़िया कह कर बुलाते थे, और हम गुड़िया दीदी| उन्ही ने ज़बरदस्ती हमारी ज़िम्मेदारी अपने कन्धों पर ले ली थी| उनके अम्मी-अब्बू को भी काम पर जाना पड़ता था, इसलिए हम उनके नए दोस्त बन गए| हमारी उम्र ढाई साल और वो ७ साल की|

जबसे हमने, वो कहते हैं ना की होश संभाला है, तभी से बस उन्ही को अपने सामने पाया| बचपन में अम्मी बताती हैं, रोज़ सुबह तैयार होकर आ जाती थी हमारे घर पर| फिर सारा दिन वो खुद ही हमें संभालती थी, कभी मंदिर ले जाती थी अपने साथ, कभी पास वाले बाग़ में, तो कभी उस इमारत भी ले जाती थी जहाँ हमारे अम्मी और अब्बू काम करते थे| हमारी पहली याद तब की है, जब हम चार साल के थे| रोज़ दोपहर खाना खाकर, हम छत पर चले जाते थे और हर दिन की तरह वो हमें पतंग उडाना सिखाती थी| खैर पतंग उड़ाना तो हम आज तक नहीं सीख पाए, पर पतंग उड़ाते हुए वो हमें जो कहानियाँ सुनाती थी उनसे कुछ ज़रूर सीख गए|

उन्ही दिनों हमारे जन्मदिन पर उन्होंने हमें एक कलम तोहफे में दी थी और फिर अब्बू से लड़ाई कर हमारा दाखिला पास में ही एक स्कूल में कराया| अब्बू चाहते थे की हम उनके साथ काम पर लगें, पर गुड़िया दीदी की बात को अब्बू ना टाल पाए| गुडिया दीदी भी हर रोज़ नाईट क्लास में जाती थी और वहां से जो भी पड़कर आती वो हमें भी सिखा देती थी| शायद इसीलिए स्कूल की पढाई हमें कभी मुश्किल नहीं लगी|

यूँ तो गुड़िया दीदी बहुत सख्त थीं हमारी पढाई को लेकर, पर एक बार हमारे अब्बू ने हमें स्कूल से भागकर क्रिकेट खेलते हुए पकड़ लिया| उस दिन सच में बहुत मार पड़ी थी, और शाम को जब गुड़िया दीदी हमें पढ़ने आई तो अब्बू ने उन्हें हमारी शिकायत लगायी| गुड़िया दी बस हंस दी, जो हमें रोज़ पढाई को लेकर डांटा करती थी वही हमारी चोट को उस शाम सहला रही थी| वैसे वो हमारा बहुत मज़ाक उडाती थी, पर प्यार भी हमें खूब करती थी| हर साल राखी हम उनके घर और ईद वो हमारे घर मानती थी, अपने हिस्से की सेवियां हमें खिला दिया करती थीं|

बस इसी तरह हमें एक बहन और उन्हें एक छोटा भाई मिल गया| और एक बार हम जब फिरोजाबाद जाकर वापस आये तो पता चला वो जा चुकी थी| किसी को कुछ नहीं पता वो कहाँ गयी पर १२ साल का रहीम एक बार फिर अकेला हो गया था| शायद गुड़िया दीदी जानती थी, की एक दिन उन्हें जाना होगा| तभी वो हमेशा हमसे कहती थी, की उनका सपना है की हम एक अफसर बनें और किसी अच्छी जगह एक मकान बनाएं| वो कहती थी जिस दिन हम अम्मी-अब्बू को लेकर नसबंदी कॉलोनी से रवाना होंगे, वो बहुत खुश होंगी|

वैसे आज हमारी १२वी क्लास का रिजल्ट आया है, फर्स्ट डिविजन आई है| हम खुश हैं, पर शायद वो होती तो और खुश होते| आज भी ये कहानी लिखते हुए हमारे होठों पे वही कविता है जो वो हमेशा हमें सुनाया करती थी| हम उसी कविता से आपको अलविदा कह रहे हैं

“इन नीले आसमानों के तले,
मुश्किलें खूब आएँगी,
पर धूप चाहे जितनी भी हो,
परछाईयाँ तुम्हे ज़रूर दिख जाएँगी

इन काले बादलों के नीचे,
जो कभी बारिश में फंस जाओ,
तो इन बूंदों से दोस्ती करलेना,
भीगोगे नहीं तुम, बस कुछ अनुभव चुरा लाओगे

और फिर उन अनुभवों को,
एक धागे से पिरो अपने गले में बाँध लेना,
फिर अपनी धडकनों की ताल पर कदम बढ़ाना
देखना जीना तो तुम बस यूँही सीख जाओगे”

 

Photograph by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel 

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