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Category Archives: Stories(hindi)

Forgotten Spears

“She waited from the first blossom of the spring,
Till the last raindrop of the monsoon
And when she was about to close her eyes, she realized
Maybe he’ll arrive with the first dewdrops of winter”

November 2010

आज भी चुनरी से टप टप कर तुम्हारी यादें टपकती रही, आज भी सिरहाने के कोने से तुम्हारे संग बितायी रातें टपकती रही| आज फिर पिताजी ने शादी की बात छेड़ी थी, आज भी रह रह कर हर आहट तुम्हारे आने का ही एहसास करा रही थी| आज भी हर बादल के संग, तुम्हारे होने की एक आस आती है| आज भी हर झोंके के संग हवा तुम्हारी साँसों का संदेशा लाती है, न जाने क्यों इतना तड़पाते हो, आ कर अब मुझे क्यों नहीं ले जाते हो| अब बस भी करो ना, देखो हाथों की मेहँदी आज भी तुम्हारे बिना फीकी सी रह गयी|

“In her almirah, she hid all the letters
She had written for him,
The letters, which still waited for an address
Of that beautiful destination to deliver the magical words
She stored in them.
The stars searched for him,
As she asked moon to deliver her messages to him,
Everynight.”

June 2011

आज कॉलेज के बैग में कुछ ख़त पड़े हुए मिले थे, याद है तुमने दिए थे| आज मुझे संदूक में वो किताब मिली थी, जो तुमने स्कूल में दी थी| याद है वो गुलाब जो पिछली मुलाक़ात में तुमने मुझे दिया था, आज भी उस किताब में मौजूद है| उस गुलाब को आज भी इंतज़ार है उन उँगलियों का जिन्होंने कभी उन्हें अपने प्यार के साथ किसी को पकड़ाया था, और किसी गुलाब को आज भी इंतज़ार है उन उँगलियों का जिन्होंने कभी उसकी पंखुड़ियों को धीरे से सहलाया था और एक भँवरे की तरह चूम कर आने वाली हर रात को खूबसूरत बना दिया था| आज भी उन्ही रातों को अपनी झोली में संभाले वो गुलाब बैठा है इंतज़ार में, अब तो आ जाओ|

“Once again she stayed awake from the midnight
When once he used to catch her last tear,
Till the first morning light
When once he used to convert that tear into the first smile”

January 2012

आज की रात सब बहुत खुश थे, पिताजी कह रहे थे इससे अच्छा लड़का मुझे नहीं मिल सकता| मैं हँस दी, मन तो था की बता दूँ मुझे पहले ही ऐसा कोई मिल चुका है| वही जिसकी याद में कल एक और रात जग कर बिता दी थी| आज मेहँदी न जाने क्यों खिल कर आ रही है, आज न जाने क्यों तुम्हारे आने की आस न जाने क्यों फिरसे आ रही है? देखो आज भी हर पल में तुम्हारा ही नाम लिखा है, कल रात भी सोते हुए आखिरी सपना तुम्हारा ही दिखा है| न जाने ससुराल कैसा होगा, न जाने जो पिताजी ने मेरे लिए चुना है वो तुम्हारे जैसा होगा| न जाने तुम कब आओगे, न जाने संग अपने कब ले जाओगे|

“With the first rays of sun, drenched by her tears,
With the last rays of moonlight, once again she caressed her fears
She looked at those letters for the last time,
As the tears washed away his memories to the bottom of her heart,
Where they still give her a comforting pain after all these years,

Those forgotten spears…”

Photography by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel 

Behen

No Ordinary Cinderella … The only person who cherished me, made me feel like I was a somebody, instead of a nobody. The only person that truly cared, the only person that mattered to me…My Sister. – Sarika

“बहन” वो तो सबकी होती है, आपकी भी होगी पर हमारी नहीं थी…. उनके आने तक|

हम रहीम खान, उम्र १८ साल, नसबंदी कॉलोनी, दिल्ली के रहने वाले हैं, अम्मी और अब्बू १६ साल पहले दिल्ली आये थे जिला फिरोजाबाद (उ.प.) से| आर्थिक स्तिथि ऐसी थी की अम्मी और अब्बू दोनों का काम करना ज़रूरी था| पास में ही बन रही एक इमारत में मिस्त्री के तौर पर काम मिला था उन्हें, हालाँकि मसला ये था की पीछे से हमें कहाँ छोड़ा जाए| बगल में ही रहती थीं वो, आरती चाची की बेटी| मज़े की बात बताएं, हमने कभी उनका नाम ही नहीं पूछा | सब उन्हें गुड़िया कह कर बुलाते थे, और हम गुड़िया दीदी| उन्ही ने ज़बरदस्ती हमारी ज़िम्मेदारी अपने कन्धों पर ले ली थी| उनके अम्मी-अब्बू को भी काम पर जाना पड़ता था, इसलिए हम उनके नए दोस्त बन गए| हमारी उम्र ढाई साल और वो ७ साल की|

जबसे हमने, वो कहते हैं ना की होश संभाला है, तभी से बस उन्ही को अपने सामने पाया| बचपन में अम्मी बताती हैं, रोज़ सुबह तैयार होकर आ जाती थी हमारे घर पर| फिर सारा दिन वो खुद ही हमें संभालती थी, कभी मंदिर ले जाती थी अपने साथ, कभी पास वाले बाग़ में, तो कभी उस इमारत भी ले जाती थी जहाँ हमारे अम्मी और अब्बू काम करते थे| हमारी पहली याद तब की है, जब हम चार साल के थे| रोज़ दोपहर खाना खाकर, हम छत पर चले जाते थे और हर दिन की तरह वो हमें पतंग उडाना सिखाती थी| खैर पतंग उड़ाना तो हम आज तक नहीं सीख पाए, पर पतंग उड़ाते हुए वो हमें जो कहानियाँ सुनाती थी उनसे कुछ ज़रूर सीख गए|

उन्ही दिनों हमारे जन्मदिन पर उन्होंने हमें एक कलम तोहफे में दी थी और फिर अब्बू से लड़ाई कर हमारा दाखिला पास में ही एक स्कूल में कराया| अब्बू चाहते थे की हम उनके साथ काम पर लगें, पर गुड़िया दीदी की बात को अब्बू ना टाल पाए| गुडिया दीदी भी हर रोज़ नाईट क्लास में जाती थी और वहां से जो भी पड़कर आती वो हमें भी सिखा देती थी| शायद इसीलिए स्कूल की पढाई हमें कभी मुश्किल नहीं लगी|

यूँ तो गुड़िया दीदी बहुत सख्त थीं हमारी पढाई को लेकर, पर एक बार हमारे अब्बू ने हमें स्कूल से भागकर क्रिकेट खेलते हुए पकड़ लिया| उस दिन सच में बहुत मार पड़ी थी, और शाम को जब गुड़िया दीदी हमें पढ़ने आई तो अब्बू ने उन्हें हमारी शिकायत लगायी| गुड़िया दी बस हंस दी, जो हमें रोज़ पढाई को लेकर डांटा करती थी वही हमारी चोट को उस शाम सहला रही थी| वैसे वो हमारा बहुत मज़ाक उडाती थी, पर प्यार भी हमें खूब करती थी| हर साल राखी हम उनके घर और ईद वो हमारे घर मानती थी, अपने हिस्से की सेवियां हमें खिला दिया करती थीं|

बस इसी तरह हमें एक बहन और उन्हें एक छोटा भाई मिल गया| और एक बार हम जब फिरोजाबाद जाकर वापस आये तो पता चला वो जा चुकी थी| किसी को कुछ नहीं पता वो कहाँ गयी पर १२ साल का रहीम एक बार फिर अकेला हो गया था| शायद गुड़िया दीदी जानती थी, की एक दिन उन्हें जाना होगा| तभी वो हमेशा हमसे कहती थी, की उनका सपना है की हम एक अफसर बनें और किसी अच्छी जगह एक मकान बनाएं| वो कहती थी जिस दिन हम अम्मी-अब्बू को लेकर नसबंदी कॉलोनी से रवाना होंगे, वो बहुत खुश होंगी|

वैसे आज हमारी १२वी क्लास का रिजल्ट आया है, फर्स्ट डिविजन आई है| हम खुश हैं, पर शायद वो होती तो और खुश होते| आज भी ये कहानी लिखते हुए हमारे होठों पे वही कविता है जो वो हमेशा हमें सुनाया करती थी| हम उसी कविता से आपको अलविदा कह रहे हैं

“इन नीले आसमानों के तले,
मुश्किलें खूब आएँगी,
पर धूप चाहे जितनी भी हो,
परछाईयाँ तुम्हे ज़रूर दिख जाएँगी

इन काले बादलों के नीचे,
जो कभी बारिश में फंस जाओ,
तो इन बूंदों से दोस्ती करलेना,
भीगोगे नहीं तुम, बस कुछ अनुभव चुरा लाओगे

और फिर उन अनुभवों को,
एक धागे से पिरो अपने गले में बाँध लेना,
फिर अपनी धडकनों की ताल पर कदम बढ़ाना
देखना जीना तो तुम बस यूँही सीख जाओगे”

 

Photograph by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel 

Intezaar Karunga Tumhara

Last evening while walking through the woods, a piece of paper flew and landed at my feet. It was a love letter without any name on it, which might have lost its destination or maybe the last sign of a love that doesn’t matter anymore, said the friend walking along with me. But hey, who said that a love stops mattering because it doesn’t, a love lasts forever. Sometimes as a tear, sometimes as a smile.

However, it reminded me of him. He made me proofread a letter he had written for her. I didn’t know who he was, I just met him during one my visits to a nearby village. He said if she’d say yes then he’d invite me to his marriage, he never did.

I guess he had forgotten. But I still haven’t forgotten that letter.

His first love letter…

आज सुबह ही अपने गाँव पहुंचा मैं, बड़ी कड़ाके की ठण्ड थी| हल्के कोहरे को चीरती हुई जब बस अपनी ही मस्ती में आगे बढे जा रही थी, तो कुछ नारियल के पेड़ दिखाई दिए थे| वही पेड़ जहाँ बचपन में न जाने कितना वक़्त पकड़न-पकड़ाई खेलते हुए बिता देते थे| याद है, एक दिन तुमने कहा था, “सुनो जब हम बड़े हो जायेंगे तब भी इन्ही पेड़ों के पास आया करेंगे, मुझे और इन्हें भूलोगे तो नहीं?” फिर तुमने पास पड़े एक पत्थर पर उस पेड़ पे हमारा नाम उकेर दिया था और कहा था की आज से ये ‘हमारा’ पेड़ है|

हमारा पेड़, जहाँ हम रोज़ आया करते थे स्कूल के बाद, याद है एक बार मास्टरजी ने पकड़ लिया था| तुम्हारे बापू ने तीन दिन तक तुम्हे घर में बंद रखा था और मेरे बाप ने मेरी जमके पिटाई करी थी| पर हमारा मिलना कभी नहीं रुका, और एक दिन नए मास्टरजी ने पकड़ा था| न जाने क्यूँ मुस्कुरा दिया थे वो, शायद वो भी किसी के साथ कभी इन पेड़ों की छाओं तले वक़्त बिताते थे|

याद है हर शनिवार को तुम मेरी पसंद के दाल चावल लाया करती थी अपने टिफिन में, कहती थी क्यूंकि हम रविवार को नहीं मिल पाएंगे इसलिए शनिवार का स्पेशल, और फिर चुप चाप बैठ मुझे खाता देख मुस्कुराती रहती थी तुम| हाँ और मुझे आज भी याद है, हर शनिवार घर जाने से पहले मेरे गाल को चूमके कहती थी “मुझे मिस करोगे न तुम?” और मैं इस डर में रहता था की कहीं तुम मुझे न भुला बैठो|

आज इन्ही पेड़ो को देख तुम्हारी फिर बहुत याद आ रही है, यहीं तो हम दोनों ने जाना था एक दुसरे के प्यार को और कसम भी खायी थी की शादी करेंगे तो एक दूसरे से वरना नहीं| देखो आज भी तुम्हारे इंतज़ार में बैठा हूँ|

जब कॉलेज गया था मैं, तब भी हम आखरी बार यहीं मिले थे| तुम्हारी आँखों में आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, याद है मेरा हाथ घंटो तक पकड़ कर बैठी रही थी तुम उस रात| और फिर उन्ही पेड़ों के नीचे ही हम सो गए थे, खैर सोये कहाँ थे बस जाग कर तारे देखे थे सारी रात | फिर सुबह जब तुम्हे बोला की मैं कॉलेज नहीं जाना चाहता, तो  मुझे चांटा मार कर तुमने कहा था “बुद्धू कॉलेज नहीं जाओगे, तो मेरे पिताजी  से मेरा हाथ कैसे मांगोगे| उन्हें तो एक पढ़ा लिखा दामाद चाहिए|” और जब मैंने तुम्हे साथ चलने को कहा, तो तुमने “पिताजी  अकेले पड़ जायेंगे” कह कर टाल दिया था|

देखो आज मैं शहर से वापस आ गया हूँ, ये पांच साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला| अब तो नौकरी भी मिल गयी है, और शायद मांगने लायक हो गया हूँ| चलोगी ना मेरे साथ तुम, जहाँ भी मैं ले जाऊं और बनोगी ना मेरा साथ, की कभी गर जो मैं गिर जाऊं| पांच साल हो गए तुम्हे देखे हुए, बस खतो के द्वारा ही तुम्हे जाना है इस समय में| क्या आज भी मुझे तुम उतना ही प्यार कर पाओगी? आज तुम्हे अपने गले लगाने के लिए मेरे पास एक हाथ कम है, क्या अभी भी मेरे गले लगना चाहोगी?

ये ख़त तुम्हारे दरवाजे पे छोड़ रहा हूँ| जो अभी भी अगर प्यार करती हो, तो आ जाना उन नारियल के पेड़ों के नीचे, इंतज़ार करूँगा तुम्हारा उसी फिरोज़ी शर्ट में जो तुमने मुझे कॉलेज जाते वक़्त दी थी|

इंतज़ार करूँगा तुम्हारा…

 

Photography by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel 

 

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