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Category Archives: Poems(hindi)

Guftagu

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चेहरा देखा है अपना?

एक खुला आसमान,

छुपा कर रखो इसे,

कोई भी बादलों का रंग पहचान लेगा

“पहचानने दो,

मुझे क्या

जब ये बदल बरसेंगे,

तो वह खुद-ब-खुद डूब जायेंगे”

बड़ी बेरेहम सी हो तुम,

बेचारे पछतायेंगे,

और अगर मैं डूब गया,

उसका क्या?

“चेहरा देखा है अपना,

गोते खाते हुए नज़र आ रहा हो,

धड़कने सुनी हैं अपनी,

दुनिया भर को जो सुनाते आ रहे हो”

तो खबर तुम तक भी पहुँच गयी?

क्या करूँ, कोशिश तो बड़ी की थी

की अपने अन्दर ही छुपा कर रखूं,

पर तुम रोज़ सामने आ जाती हो

“क्यों बादलों का रंग मैं भी पढना जानती हूँ,

पर मानसून के ये बदल कुछ महीनों में गायब हो जाते हैं,

गर्मी में कुछ सुकून दे कर,

फिर सर्दियों की आड़ में कहीं गुम हो जाते हैं।”

बादल नहीं,

मैं नीला आसमान हूँ,

“हर कोई यही कहता है,

ये न समझना की मैं पहेली आसान हूँ।”

खुशकिस्मत हूँ,

जो यह पहेली सुलझाने का मौका मिला,

“बातें तो बहुत करते हो,

देखेंगे कहाँ तक चलेगा ये सिलसिला।”

——————————————-

चला था सिलसिला,

बहुत दूर तक चला था वो काफिला,

फिर वो कहते हैं न,

“यू नेवर नो वेयर लाइफ विल टेक यू”

तो बस हुआ यूँ,

की हम आज भी,

उनकी भूली हुई यादों में बसते हैं,

और जो कभी रह रह कर,

ये गुफ्तगू याद आती है,

तो वो हल्का सा दर्द मिटने को हम बस यूँहीं हँसते हैं …

 

Photograph by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel

Yaadon ka Kabila


यादों का कबीला,
आज फिर मुझे तेरे शहर ले जाता है,
सर्दियों की उन सुबह,
जब हलकी से धुंध से निकल,
तुम सूरज बन मेरे सामने आती थी,
मुस्कुराती थीं,
और फिर धीरे से अपने शब्दों का रस,
मेरे कानों में घोल जाती थी

यादों का कबीला,
आज फिर मुझे उन रातों की याद दिलाता है,
खुला आसमान और अमावस की वह रात,
तारों की चादर तले,
बैठा मेरा चाँद मेरे साथ,
और फिर चुपके से अपने होठों के निशाँ,
मेरे गालों पर तुम छोड़ जाती थी,
मेरे काँधे पर सर रख, गीत कई गुनगुनाती थी

यादों का कबीला,
आज फिर मुझे उन सुनहरी सुबहों की तरफ खींच लाता है,
सूरज की किरणों का दुपट्टा ओढ़े तुम पायल छनकाती आती थी,
लगता जैसे हर सुबह, हर दिन
मुझे तुमसे मिलाने के लिए ही जगाती थी,
और फिर तुम मुस्कुरा कर, थोड़ा इठला कर
मेरे नज़दीक बैठ, अपने हाथों बनी चाय की खुशबु से
मुझे प्यार से उठती

यादों का कबीला,
आज फिर उस चाय के प्याले की तरह,
एक अजीब सी खुशनुमा गर्माहट मुझमे छोड़ जाता है,
कुछ पल याद दिलाता है, तो कुछ भूलने पर मजबूर कर जाता है

यादों का कबीला,
आज फिर मुझे तुम्हारी तस्वीर के पास ले आता है,
जो तुम साथ नहीं तो क्या हुआ,
वह आज भी सुबह की पहली किरण संग, तुम्हारी कुछ नयी यादें मेरे दरवाज़े पर छोड़ जाता है|

 

Photograph by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel

Peeche mudkar dekha tha aaj…

(Scroll down for english font)

 

पीछे मुड़कर देखा था आज,

हर याद दौड़ लगाती सी नज़र आई थी,

मेरी तरफ

 

और मैं,

परियों की तरह,

बस आगे, कुछ और आगे बढती चली गयी..

 

आसमान में उड़कर देखा था आज,

हर बादल चूमना चाहता था,

बस मुझको ही

 

और मैं,

थोड़ा मुस्कुराती हुई,

अपने सपनो की तरफ उड़ती चली गयी…

 

कुछ नए मोड़ों पर मुड़कर देखा था आज,

लगा जैसे हर अजनबी गीत गा रहा था,

मेरे लिए ही

 

और मैं,

आँखों को मूँद कर,

उन गीतों में कुछ और उलझती चली गयी …

 

कुछ पुराने वादों को पूरा करके देखा था आज,

लगा जैसे ज़िन्दगी फिर लौट आई हो,

मेरी बाहों में

 

और मैं,

थोड़ा इठलाती हुई सी,

इस दुनिया को बस अपने रंग में रंगती चली गयी…

 

Peeche mudkar dekha tha aaj,

har yaad daud lagati si nazar aayi thi,

meri taraf

 

Aur main,

pariyon ki tarah,

bas aage, kuch aur aage badhti chali gayi…

 

Aasmaan mein udkar dekha tha aaj,

har baadal choomna chahta tha,

bas mujhko hi

 

Aur main,

thoda muskurati hui,

apne sapno ki taraf udti chali gayi…

 

Kuch naye modon par mudkar dekha tha aaj,

laga jaise har ajnabi geet ga raha tha,

mere liye hi

 

Aur main,

aankhon ko moond kar,

unn geeton mein kuch aur ulajhti chali gayi…

 

Kuch purane vaadon ko pura karke dekha tha aaj,

laga jaise zindagi fir laut aayi ho,

meri baahon mein

 

Aur main,

thoda ithlati hui si,

iss duniya ko bas apne rang mein rangti chali gayi…

 

Kuch Yaadein Africa Ki

Whenever I look at the pictures from Africa, each one of them tries to show me the pain hidden in that continent. But then I found this one in Sarika’s album, trying to inspire me, trying to reveal that it’s one of the most beautiful places on earth and trying to find beauty where everyone tries to find the beast.

 

आज़ादियाँ आज यूँ बुलाती हैं मुझे, 

वादियाँ आज यूँ रिझाती हैं मुझे, 

हवाएं आज यूँ झुलाती हैं मुझे, 

और फिर कुछ यूँ उड़ता हूँ मैं…  

Blue and Blues, I’ve seen every shade of them. These lands are my bed and these skies are my canvas now. All I have to do is make myself a child once again somehow. All I have to do is learn to dream once more, and all I have to do, is learn to let out this scream once more.

I have been burnt and left to die; I have withered in the hostile winds.

बारिशों की खोज में, 

न जाने कितने काले बादलों को हमराज़ बनाया है मैंने,

ख्वाहिशों की खोज में

न जाने कितने अनसुलझे ख्यालों को आवाज़ बनाया है मैंने, 

As I see those kids, fearless and tearless. I remember the one that was lost somewhere, sometime ago. I sit and look at the sky, as if it’s an album of everything I shouldn’t have forgotten. Then suddenly, a kid pulls me towards them, asking me to join their game.

I want to join them, but I feel something is holding me back. I want to be free once again, but there’s something I lack. I want to smile once again, but the only colour I possess is black.

फिर अपने दिल को ही टटोल कर 

शायद उन भूली यादों को ढूँढता हूँ मैं, 

उन बंद पोटलियों को खोल कर, 

फिर खुद से किये कुछ वादों को ढूँढता हूँ मैं, 

The kid leaves, leaving me behind. Autumn leaves, shedding from the tree of worries in my mind.  I look at the clouds and pull out my pen; I let the sky fill it with ink once again.

I sit silently, letting those memories grind me. I sit intently, letting those stories find me. I feel, I wonder and I smile, I do everything I had forgotten all this while. Now, I feel at home, I feel alive once again. I feel the happiness that once remained veiled behind the pain.

I want to fly; I want to steal some colours from this sky. I want to run, sing and dance. Once again, I want to enter that trance.

नीली ज़मीन, हरा आसमान 

सफ़ेद बादल, काले ख्याल 

इन सबको पीछे छोड़, मैं फिर चलता हूँ 

एक सपने की ओर, जिसे न जाने क्यों देखना छोड़ दिया था मैंने 

I stand up and move slowly towards my new friends calling me. I close my eyes, spread my wings, and fly away from the loose ends stalling me.

Chaand Se Saja Kamra…

This time photographer herself is the muse. 

कभीकभी रातों को युँही उल्लुओं की तरह छत पर बैठे रहते थे हम, तो वह मुझे फुसफुसा कर कहती..

“वो चाँद लाकर दो न मुझे,

उससे तुम्हारा कमरा सजाऊँगी,

जब तुमसे दूर चली जाऊं,

तो उसे देख लेना, तुम्हे हमेशा याद आऊँगी”

 

फिर मैं उसे देख हँस पड़ता, तो वह रूठ जाती थीमैं छत के इस कोने में होता और

वह दूसरे में जाकर बैठ जाती थी..

 

“कभी-कभी अचानक मुस्कुरा पड़ती,

और मुस्कुरा कर कहीं गुम हो जाती,

ना जाने आँखें बंद कर क्या सोचने लगती,

और सोच कर उस राज़ को छत के किसी अँधेरे कोने में छोड़ आती…”

 

और मैं,

“बस उसे युँही पढ़ता रहता,

अपने मन की तिजोरियों को,

उसकी यादों से भरता रहता..”

 

शायद मुझसे कुछ जुड़ा था उसका, इसलिए हर रात किसी न किसी बहाने से छत पर मिलने आ जाती|

फिर एक सर्दियों की रात वोह बोली..

“मुझे आइस-क्रीम खानी है,

हाँ हाँ पता है तबियत ख़राब होगी मेरी,

पर फिर तुम अपनी गोद में मेरा सर रख कर मुझे सुलाना,

और सारी रात अपनी उँगलियों से मेरे बाल सहलाते रह जाना…”

 

इससे पहले की मैं कुछ बोल पाता, वह फिर चालू हो जाती…

“और हाँ, ख़बरदार जो उठ कर कहीं गए,

देखो बिना बतलाये मैं चली जाउंगी,

जी भर कर फिर रोते रहना,

कभी वापस न आऊँगी…”

 

फिर हम आइस-क्रीम खाने जाते थे, और वह ख़राब तबियत का बहाना कर मेरी गोद में सर रख सो जाया करती थी|

 

और मैं..

” युँही उसको ताकता रहता,

उन बंद आँखों के पीछे छिपे…

कुछ टूटे सपनों में झांकता रहता..”

 

रोज़ सुबह की चाय में तीन चम्मच चीनी मिला कर पीती थी,

और जब भी मैं उसे Diabetes हो जाएगा कह कर डांटता तो मुझसे कहती…

“हो जाने दो, अच्छा ही है न

जब तक तुम डाक्टरी करके अपनी क्लिनिक नहीं खोलते,

मैं रोज़ ज्यादा चीनी खा जाया करुँगी,

फिर हमेशा तुम्हारी क्लिनिक में ही,

अपना इलाज कराने आया करुँगी…”

 

तब बस एक महीना ही रह गया था उसके जाने में, न जाने कैसे दो साल बीत गए,

रोज़ उसे वह मीठी चाय पीते देख|

 

और मैं…

“बस यही सोचता रह जाता,

की उस छत को क्या जवाब दूंगा,

जहाँ हम अपनी रातें बिताते थे,

उन चाँद-तारों को क्या जवाब दूंगा,

जिनको अपनी फ़ालतू बातें सुनाते थे…”

 

देखते देखते एक दिन वोह चली गयी, कुछ दिन बाद उसकी शादी का कार्ड आया था मुझे|

 

चाह कर भी जा न सका…

“उस रात आँखें छलक आयीं थीं,

और खिड़की खोली,

तो सर्द हवाएं उसकी शायद कुछ गम हुई

यादें लायीं थीं|

फिर जो खिड़की से बाहर देखा,

तो चाँद अपनी चांदनी संग

मेरा कमरा सजा रहा था,

और पास वाली गली में,

एक आइस-क्रीम वाला रह रह कर चिल्ला रहा था…”

चटनी जैसा शहर

 

ये शहर,

कभी अजनबी, कभी अनजाना सा लगता है

और कभी कभी दोस्त पुराना सा लगता है

 

कभी ये मेला कोई लगता है,

कभी भीड़ में भी तन्हाई का एहसास कराता है,

तो कभी अकेलेपन में दोस्त नया दे जाता है

 

यहाँ एक समुन्दर का किनारा है,

मेरी हर शाम वही कटती है,

ये लहरें ही तो हैं, एक हमराज़ दोस्त की तरह,

अपनी हर छोटी बड़ी बात इनसे कह जाता हूँ,

कभी कोई दुःख, या कभी कोई नयी खुशखबरी मिली हो

तो सबसे पहले इन्हें ही आकर बताता हूँ

 

मेरी तरह और भी कई आते हैं,

अपनी अपनी भाषा में अपने अपने राज़ बताते हैं,

ये शहर जैसे एक चटनी की तरह है,

थोडा खट्टा, थोडा मीठा तो कभी थोडा तीखा

नजाने कितने मसालों और मसलों से बनी है ये चटनी,

शायद तभी इसका स्वाद इतना निराला है

 

सोचता था न जाने मुंबई कैसा होगा,

इतनी भीड़, इतनी भागदौड़, क्या संभल पाऊंगा मैं?

सच बोलूं तो कई बार गिरा हूँ यहाँ,

पर आखिर में इसी शहर ने संभाला है मुझे,

और संभालते संभालते,

आज शायद अपने पैरों पर खड़ा होना भी सिखा दिया है

 

ये चटनी जैसा शहर,

कभी तो बहुत हसाता है,

और कभी रुला सा जाता है,

लेकिन फिर जब भी घर वापस जाने को जी करता है,

तो जैसे ये शहर हाथ मेरा थाम जाता है

 

कोई जादू है यहाँ,

की इतने लोगों की भीड़ में भी,

अपनी खुद की एक जगह मिल जाती है,

इस शहर में मानो जैसे

करोड़ों छोटी छोटी दुनिया हैं,

हर कोई अपनी एक दुनिया चुन लेता है

और फिर उसी में खो जाता है

 

ये शहर जैसे हर किसी को अपनी बाहों में बुलाता है,

एक सपनो की दुकान ही तो है चटनी जैसा शहर,

क्योंकि देखा जाए तो, यहाँ हर किसी का कोई ना कोई सपना है

और इस भागदौड़ में वही एक ख्याल ही तो बस अपना है

 

उसी ख्याल को लेकर

औरों की तरह हर शाम यहाँ आता हूँ

इस चटनी जैसे शहर का स्वाद कुछ और चखने

 

Photograph by: Sarika Gangwal 

Written by: Abhinav Chandel 

Pariyo si…

नीले आसमानों में कुछ काले बादल,

बादलों में बारिश की कुछ बूँदें,

बूंदों की मासूमियत,

सच बोल,

उन्होंने वो तुझसे ही पायी हैं ना?

 

बागों में फूल

फूलों में रंग,

रंगों वाली एक इन्द्रधनुष की रेखा,

सच बोल,

वो अपनी उँगलियों से तूने ही बनायीं है ना?

 

सुनसान रास्तों पर कोहरे से घिरा,

खड़ा हूँ मैं

और रह रह कर किसी की खुशबू  का एहसास हो जाता है आज,

सच बोल,

इन कोहरे की परतों को चीरती हुई,

मेरे नज़दीक तू आई है ना?

 

मेरे हाथों में एक गिटार,

गिटार की तारों से खेलती मेरी उँगलियों,

और बन जाती है कुछ नयी धुनें,

सच बोल,

कल रात सपने में आकर,

तूने ही गुनगुनायी  है ना?

 

जंगलों से गुज़रती एक राह,

उन पर कुछ क़दमों के निशाँ,

ले जाती मुझे मेरे बिछरे यार के करीब,

सच बोल,

अपने कोमल पैरों से,

वो निशानों वाली चादर तुने ही बिछायी है ना?

 

काली काली ये रातें,

और खोया खोया सा मैं,

आँखों से दूर आज नींद मेरी,

सच बोल,

अपने जादू से,

तूने ही चुराई है ना?

 

एक खाली कागज़,

उस पर सरपट दौड़ती कलम,

और कुछ अनकहे अजनबी शब्दों से बनती एक कविता,

सच बोल,

अपनी इन आँखों से,

तूने ही बतलायी है ना?

 

Neele aasmaano mein kuch kaale baadal,

Baadlon mein baarish ki kuch boondein,

Boondon ki masoomiyat,

Sach bol,

Unhone woh tujhse hi payee hai na?

 

Baagon mein phool,

Phoolon mein rang,

Rangon waali indradhanush ki rekha,

Sach bol,

Woh apni ungliyon se tune hi banayee hai na?

 

Sunsaan raaston par kohre se ghira,

Khada hun main,

Aur reh reh kar kisi ki khushboo ka ehsaas ho jaata hai aaj,

Sach bol,

Inn kohre ki parto ko cheerti hui,

Mere nazdeek tu aayee hai na?

 

Mere haathon mein ek guitar,

Guitar ki taaron se khelti meri ungliyan,

Aur ban jaati hain kuch nayi dhunein,

Sach bol,

Kal raat sapne mein aakar,

Tune hi gungunayee hai na?

 

Junglon se guzarti ek raah,

Unn par kuch kadmo ke nishaan,

Le jaati mujhe mere bichre yaar ke kareeb,

Sach bol,

Apne komal pairon se,

Woh nishaano waali chaadar tune hi bichayee hai na?

 

Kali kali ye raatein,

Aur khoya khoya sa main,

Aankhon se duur aaj neend meri,

Sach bol,

Apne jaadu se,

Tune hi churayee hai na?

 

Ek khali kagaz,

Uss par sarpat daudti kalam,

Aur kuch ankahe ajnabee shabdo se banti ek kavita,

Sach bol,

Apni inn aankhon se,

Tune hi batlayee hai na?

 

Photograph by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel

Behen

No Ordinary Cinderella … The only person who cherished me, made me feel like I was a somebody, instead of a nobody. The only person that truly cared, the only person that mattered to me…My Sister. – Sarika

“बहन” वो तो सबकी होती है, आपकी भी होगी पर हमारी नहीं थी…. उनके आने तक|

हम रहीम खान, उम्र १८ साल, नसबंदी कॉलोनी, दिल्ली के रहने वाले हैं, अम्मी और अब्बू १६ साल पहले दिल्ली आये थे जिला फिरोजाबाद (उ.प.) से| आर्थिक स्तिथि ऐसी थी की अम्मी और अब्बू दोनों का काम करना ज़रूरी था| पास में ही बन रही एक इमारत में मिस्त्री के तौर पर काम मिला था उन्हें, हालाँकि मसला ये था की पीछे से हमें कहाँ छोड़ा जाए| बगल में ही रहती थीं वो, आरती चाची की बेटी| मज़े की बात बताएं, हमने कभी उनका नाम ही नहीं पूछा | सब उन्हें गुड़िया कह कर बुलाते थे, और हम गुड़िया दीदी| उन्ही ने ज़बरदस्ती हमारी ज़िम्मेदारी अपने कन्धों पर ले ली थी| उनके अम्मी-अब्बू को भी काम पर जाना पड़ता था, इसलिए हम उनके नए दोस्त बन गए| हमारी उम्र ढाई साल और वो ७ साल की|

जबसे हमने, वो कहते हैं ना की होश संभाला है, तभी से बस उन्ही को अपने सामने पाया| बचपन में अम्मी बताती हैं, रोज़ सुबह तैयार होकर आ जाती थी हमारे घर पर| फिर सारा दिन वो खुद ही हमें संभालती थी, कभी मंदिर ले जाती थी अपने साथ, कभी पास वाले बाग़ में, तो कभी उस इमारत भी ले जाती थी जहाँ हमारे अम्मी और अब्बू काम करते थे| हमारी पहली याद तब की है, जब हम चार साल के थे| रोज़ दोपहर खाना खाकर, हम छत पर चले जाते थे और हर दिन की तरह वो हमें पतंग उडाना सिखाती थी| खैर पतंग उड़ाना तो हम आज तक नहीं सीख पाए, पर पतंग उड़ाते हुए वो हमें जो कहानियाँ सुनाती थी उनसे कुछ ज़रूर सीख गए|

उन्ही दिनों हमारे जन्मदिन पर उन्होंने हमें एक कलम तोहफे में दी थी और फिर अब्बू से लड़ाई कर हमारा दाखिला पास में ही एक स्कूल में कराया| अब्बू चाहते थे की हम उनके साथ काम पर लगें, पर गुड़िया दीदी की बात को अब्बू ना टाल पाए| गुडिया दीदी भी हर रोज़ नाईट क्लास में जाती थी और वहां से जो भी पड़कर आती वो हमें भी सिखा देती थी| शायद इसीलिए स्कूल की पढाई हमें कभी मुश्किल नहीं लगी|

यूँ तो गुड़िया दीदी बहुत सख्त थीं हमारी पढाई को लेकर, पर एक बार हमारे अब्बू ने हमें स्कूल से भागकर क्रिकेट खेलते हुए पकड़ लिया| उस दिन सच में बहुत मार पड़ी थी, और शाम को जब गुड़िया दीदी हमें पढ़ने आई तो अब्बू ने उन्हें हमारी शिकायत लगायी| गुड़िया दी बस हंस दी, जो हमें रोज़ पढाई को लेकर डांटा करती थी वही हमारी चोट को उस शाम सहला रही थी| वैसे वो हमारा बहुत मज़ाक उडाती थी, पर प्यार भी हमें खूब करती थी| हर साल राखी हम उनके घर और ईद वो हमारे घर मानती थी, अपने हिस्से की सेवियां हमें खिला दिया करती थीं|

बस इसी तरह हमें एक बहन और उन्हें एक छोटा भाई मिल गया| और एक बार हम जब फिरोजाबाद जाकर वापस आये तो पता चला वो जा चुकी थी| किसी को कुछ नहीं पता वो कहाँ गयी पर १२ साल का रहीम एक बार फिर अकेला हो गया था| शायद गुड़िया दीदी जानती थी, की एक दिन उन्हें जाना होगा| तभी वो हमेशा हमसे कहती थी, की उनका सपना है की हम एक अफसर बनें और किसी अच्छी जगह एक मकान बनाएं| वो कहती थी जिस दिन हम अम्मी-अब्बू को लेकर नसबंदी कॉलोनी से रवाना होंगे, वो बहुत खुश होंगी|

वैसे आज हमारी १२वी क्लास का रिजल्ट आया है, फर्स्ट डिविजन आई है| हम खुश हैं, पर शायद वो होती तो और खुश होते| आज भी ये कहानी लिखते हुए हमारे होठों पे वही कविता है जो वो हमेशा हमें सुनाया करती थी| हम उसी कविता से आपको अलविदा कह रहे हैं

“इन नीले आसमानों के तले,
मुश्किलें खूब आएँगी,
पर धूप चाहे जितनी भी हो,
परछाईयाँ तुम्हे ज़रूर दिख जाएँगी

इन काले बादलों के नीचे,
जो कभी बारिश में फंस जाओ,
तो इन बूंदों से दोस्ती करलेना,
भीगोगे नहीं तुम, बस कुछ अनुभव चुरा लाओगे

और फिर उन अनुभवों को,
एक धागे से पिरो अपने गले में बाँध लेना,
फिर अपनी धडकनों की ताल पर कदम बढ़ाना
देखना जीना तो तुम बस यूँही सीख जाओगे”

 

Photograph by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel 

Bachpan, woh kya hota hai?

बचपन,

वो क्या होता है?

ये जाने बिना ही हम बड़े हो जाते हैं

खुदकी ज़िम्मेदारी हम छोटी उम्र से ही बन जाते हैं

 

खुशियाँ,

वो क्या होतीं हैं?

ये जाने बिना ही अपने दुखों पर मुस्कुरा देते हैं,

और हकीकत ना सही सपनो में ही हम अपना घर बसा लेते हैं

 

खिलौने,

वो हमारे लिए कहा होते हैं?

चाय की दुकान जहाँ काम करते हैं,

वही पड़े पत्थरों से गुट्टे खेल लेते हैं

जो कभी माँ संग सफाई करने गए,

तो मेमसाब से ही कुछ टूटे हुए गुड्डे गुड़िया ले लेते हैं

 

आइस क्रीम,

हाँ वो देखने में अच्छी लगती है, पर हम पर कहाँ फब्ती है?

पर कभी कभार वो गोले वाला बरफ थोड़ी दे देता है,

मेरा छोटा भाई उसी में खूब मज़ा ले लेता है

 

टीवी,

वो हमारे नसीब में कहाँ?

बापू संग जब होटल में बर्तन मांजने जाते हैं,

वही थोड़ा देख आते हैं,

फिर वो मालिक जोर से चांटा लगा कर कहता है,

वेटर का बच्चा टीवी के सामने क्यूँ खड़ा रहता है

 

इज्ज़त,

वो गरीबों के लिए थोड़ी ना होती है?

हमारा काम तो बस हर उस बोझ को उठाना होता है,

जो औरों की शान खिलाफ होता है

 

पैसे,

हाँ वो थोड़े बहुत मिल जाते हैं,

आप १ घंटे में १००० रुपये उड़ाते हैं,

हम उन्ही १००० रुपियों से अपना महीना चलते हैं 

 

खाना,

हाँ कभी कभार भरपेट  मिल जाता है,

माँ के हाथों से जो कभी थोड़ी दाल रोटी पेट में जाती है,

सच्ची मुच्ची फिर उस रात बहुत अच्छी नींद आती है

 

स्कूल,

आपका मतलब वो पास वाली इमारत,

जहाँ बहुत सारे बच्चे बसते लेकर जाते हैं?

हाँ, वहां जाने का मन तो करता है,

पर बापू की मार से डर लगता है

वो कहते हैं, ये इमारतें हमारे लिए नहीं

हम तो इन झोपड़ियों में ही सही

 

नाम,

याद नहीं माँ ने क्या दिया था,

कभी जरूरत भी नहीं पड़ी,

माँ बेटा कह कर बुलाती है,

और बाकी दुनिया की तो छोड़ दो,

शायद हमें अपने बीच नहीं देखना चाहती है

 

हाँ याद आया, मेरा नाम आशा है ….

 

Bachpan,

Woh kya hota hai?

Ye jaane bina hee hum bade ho jaate hain,

Khudki zimmedari hum choti umar se hi ban jaate hain

 

Khushiyan,

Woh kya hoti hain?

Ye jane bina hi apne dukhon par muskura dete hain,

Aur haqeeqat na sahi sapno mein hi apna ghar basa lete hain

 

Khilone,

Woh hamare liye kahan hote hain?

Chai ki dukaan jahaan kaam karte hain,

Wahin pade patharon se gutte khel lete hain,

Jo kabhi maa sang safai karne gaye,

Toh memsahab se hi kuch toote hue gudde gudiya le lete hain

 

Ice cream,

Haan woh dekhne mein achchi lagti hai, par hum par kahan fabti hai?

Par kabhi kabhar woh gole waala baraf thodi de deta hai,

Mera chota bhai ussi mein khoob mazaa le leta hai

 

TV,

Woh hamare naseeb mein kahaan?

Baapu sang jab hotel mein bartan maanjne jaate hain,

Wahin thoda dekh aate hain,

Fir woh maalik zor se chaanta lagaa kar kehta hai,

Waiter ka bachcha tv ke saamne kyun khada rehta hai

 

Izzat,

woh gareebon ke liye thodi na hoti hai?

Hamara kaam toh har uss bojh ko uthaana hota hai,

Jo auron ki shaan ke khilaaf hota hai

 

Paise,

Haan woh thode bahut mil jaate hain,

Aap 1 ghante mein 1000 rupiye udaate hain,

Hum unhi 1000 rupiyon se apna mahina chelate hain

 

Khaana,

Haan kabhi kabhar bharpet mil jaata hai,

Maa ke haathon se jo kabhi dal roti pe mein jaati hai,

Sachchi muchchi fir raat bahut achchi neend aati hai

 

School,

Aapka matlab woh pass waali imaarat,

Jahaan bahut saare bachche baste lekar jaate hain?

Haan, wahan jaane ka mann toh karta hai,

Par baapu ki maar se darr lagta hai

Woh kehte hain, ye imaaratein hamare liye nahin

Hum toh inn jhopdiyon mein hi sahi

 

Naam,

Yaad nahin maa ne kya diya tha,

Kabhi zaroorat hi nahin padi

Maa beta keh kar bulaati hai,

Aur baaki duniya ki toh chod do,

Shayad humein apne beech nahin dekhna chahti hai

 

Haan yaad aaya, mera naam aasha hai…

 

Photograph by: Sarika Gangwal

Written by: Abhinav Chandel 

New girl in the town

She’s the new girl in the town, no one knows where she’s from or what’s her name. However, she has become the topic of discussion everywhere. They all want to know about this beautiful girl, but do they really want to know about her? I guess some things remain beautiful only in mysteries.

They’re scared to talk to her, they think it might shatter their imaginations about her. They’re scared to touch her, what if she turns to dust. They just want to stare at her, you just want to stare at her. This new girl in the town, she’s your…….

No, I guess she’s everyone’s new crush.

She’s so beautiful,
What can I say,
And look at that smile,
Seriously what can I say

Look into those eyes,
And feel your soul stir up,
You seriously think,
There’s something I should say

Look at her skin,
That immaculate complexion reflecting
All the beautiful dreams
I am too distracted, to say anything

Look at that beautiful masterpiece,
And close your eyes,
Now do you feel the need
For something to be said

And tell me if there’s something still
Left unsaid, or wait
Don’t say it, because there are
Thousands of stories left unsaid, in her eyes
I have picked mine, and you pick yours.
Now let your imagination fly in those blue skies

And say if you want to,
But I know you won’t be able to.
Because I know the feeling,
A feeling so pure, that you won’t be able to explain
But then when do we have to explain everything,
We’ll just look at her, and let the serenity fade away our pain

Just look at her,
And zip your lips,
Just look at her,
Your worries today, she’ll eclipse.

And what more can I say,
There’s nothing I will,
There’s nothing you will

Seriously, what can I say..
 Photograph by: Sarika Gangwal

 Written by: Abhinav Chandel 

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