चेहरा देखा है अपना?
एक खुला आसमान,
छुपा कर रखो इसे,
कोई भी बादलों का रंग पहचान लेगा
“पहचानने दो,
मुझे क्या
जब ये बदल बरसेंगे,
तो वह खुद-ब-खुद डूब जायेंगे”
बड़ी बेरेहम सी हो तुम,
बेचारे पछतायेंगे,
और अगर मैं डूब गया,
उसका क्या?
“चेहरा देखा है अपना,
गोते खाते हुए नज़र आ रहा हो,
धड़कने सुनी हैं अपनी,
दुनिया भर को जो सुनाते आ रहे हो”
तो खबर तुम तक भी पहुँच गयी?
क्या करूँ, कोशिश तो बड़ी की थी
की अपने अन्दर ही छुपा कर रखूं,
पर तुम रोज़ सामने आ जाती हो
“क्यों बादलों का रंग मैं भी पढना जानती हूँ,
पर मानसून के ये बदल कुछ महीनों में गायब हो जाते हैं,
गर्मी में कुछ सुकून दे कर,
फिर सर्दियों की आड़ में कहीं गुम हो जाते हैं।”
बादल नहीं,
मैं नीला आसमान हूँ,
“हर कोई यही कहता है,
ये न समझना की मैं पहेली आसान हूँ।”
खुशकिस्मत हूँ,
जो यह पहेली सुलझाने का मौका मिला,
“बातें तो बहुत करते हो,
देखेंगे कहाँ तक चलेगा ये सिलसिला।”
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चला था सिलसिला,
बहुत दूर तक चला था वो काफिला,
फिर वो कहते हैं न,
“यू नेवर नो वेयर लाइफ विल टेक यू”
तो बस हुआ यूँ,
की हम आज भी,
उनकी भूली हुई यादों में बसते हैं,
और जो कभी रह रह कर,
ये गुफ्तगू याद आती है,
तो वो हल्का सा दर्द मिटने को हम बस यूँहीं हँसते हैं …
Photograph by: Sarika Gangwal
Written by: Abhinav Chandel









